शुक्रवार, 6 मार्च 2015

ट्रेन - 4

ट्रेन - 4

“चल भाई, तुजसे मिल के बड़ा मजा आया, भोपाल आओ तो याद जरुर करीयो”
ट्रेन भोपाल स्टेशन पे थी और सलमान खान मुझे बाय बोल रहा था, मैंने भी औपचारिकता निभा दी, सुबह के 6 बज गये थे, नींद तो अब आने से रही,में फिर पहुँच गया शर्द हवाओ का हाल जानने....
स्टेशन दर स्टेशन नजारा खुबसुरत बन रहा था, दूर क्षितिज में कोई सूरज अंगड़ाई ले रहा था....
आदत से मजबूर में फिर पहुँच गया अपने लेपटोप के पास...
कुछ नजारे लिखने....
कुछ फ़साने लिखने....

“गुड मोर्निंग” सबसे उपर वाली बर्थ से आवाज आई...
मैंने उपर देखा तो एक मासूम सी मुस्कान उसके होठों पे खेल रही थी....
“गुड मोर्निंग” मैंने भी कुछ उसी लहजे में उनको विश किया...
आयुष अभी भी सो रहा था बाकि तीन इंजनियर भोपाल उतर गये थे, अब में और एक खुबसुरत अजनबी ही बचे थे जो कुछ बात कर सके....
वो निचे उतरी थोडा डिस्टेंस रख के मेरी ही सिट पे बैठ गई....
“so आप लिखते हो?” उसकी नजर मेरे लेपटोप पे थी...
कोई जब मुझे लिखता देखता है तब में थोडा असहज हो जाता हु...
मैंने जट से लेपटोप बंध किया, “नहीं वो तो बस ऐसे ही” मेरी जुबान थोड़ी लड़खड़ाई....
“Hii, में कशिश” उसने लम्बी उंगलियो वाला हाथ आगे बढ़ाया...
उसके नेल पेंट का कलर उसके टॉप से मेच कर रहा था, मैंने सोचा लडकिया ऐसी चीजो के लिए टाइम कहा से निकाल लेती है....
“कुश” मैंने मुस्कुराते हुए हाथ मिलाया...
पहेली बार मैंने उसके चहरे को गौर से देखा, बड़ी गोल आँखे थी, अभी अभी खुलने की वजह से वो बहुत प्यारी दिख रही थी, उसके गाल में शायद किसीने कश्मीरी सेब फसाया था, उसके होठो को देख के लग रहा था की उसने अभी अभी लिपगार्ड लगाया था, उसके बदमाश बाल बिखरे पड़े थे, कुछ उसके कान को तंग कर रहे थे तो कुछ आपस में ही उलज रहे थे, यकीनन वो बहुत खुबसुरत थी J
(आमतौर पे लडकिया उठने के तुरंत बाद काफी अजीब लगती है पर यहा केस थोडा अलग था)
“so कुश कहा से हो आप?”
“इंदौर, आप?”
“मैं कटनी से हु अभी बेंगलुरु जॉब करती हु, आप क्या करते हो ?”
“मैं पार्ट टाइम पढाई और फुल टाइम मजे करता हु”
मेरी बात सुनके उसकी आँखे भी हँसने लगी, बहुत खुबसुरत नजारा था....
“इंजनियरिंग के लास्ट सेम में हु”
और तभी कुम्भकर्ण जागा...
“गुड मोर्निंग आयुष”
लड़की पास में होने से मैंने उसे आम लोगो की तरह wish किया (इंजनियरिंग में विश करने की प्रथा कुछ अलग होती है;))
“गुड मोर्निंग भाई कहा पहुंचे?”
“सुजालपुर निकला अभी, btw रात को तेरे लिए कोल आया था..”
फिर मैंने उसे रत को 12 बजे आये उस बुरे सपने की डिटेल्स बताई....
“मैं क्या करू इस लडकी का?”
“छोड़ दे” मेरा अंतर्मन फिर चिल्ला उठा...
“पास वाले कोच में प्लग है, तू फोन चार्ज करले और अभी मेरे फोन से उससे बात करले”
आयुष “रिमांड कोल” की तरफ बढ़ा, और अब सेक्शन में दो ही लोग थे....
कशिश ने इयरप्लग लगाये हुए थे, बिच बिच में वो गीत की लाइन्स गाने लगती थी, उसकी इस हरकत पे मैं हौले से मुस्कुराता था, मुझे देख वो भी हँसती थी...
कुछ देर बाद में फिर दरवाजे के पास पहुंचा, हमेशा की तरह कुदरत ने एक और खुबसुरत नजारा मेरे सामने पेश किया....
मैं कशिश और कुदरत की खूबसूरती की तुलना करने लगा, मुझे भी नहीं पता की मैंने ऐसा क्यों किया?!
जो भी हो मुझे लिखने को नया मटिरियल मिल रहा था, मैं फिर गया अपने लेपटोप के पास और “हीरो” बन गया...
कशिश ने इयरप्लग हटाये और मेरी सिट पे आके बैठ गई, इस बार दुरी कम थी जो मुझे थोडा असहज बना रही थी...
वो कुछ बोली नहीं बस पढने लगी...
फिर धीरे से मेरी आँखों में देखा और मुस्कुराके पूछा “कहा से सिखा ऐसा लिखना?”
इस प्रश्न का जवाब, मैं शायरी में दे देता पर वो थोडा ज्यादा हो जाता तो मैंने मामले को रफा दफा करने का फैसला किया...
“अरे ये शायरी, कुछ बड़े शायरों की रचनाए है मैंने कही सुनी तो उसे अपने कलेक्शन में रख रहा हु”
उसे ये बोलते वक़्त मेरा उससे eye-contact नहीं था ....
तभी वहा से एक चाय वाला निकला...
“भैया दो चाय करना”
उसने अपने ओरेंज पर्स से बीस रुपये निकाले, मैं अपने जींस से अपना वोलेट छिनने में लगा था पर आख़िरकार जींस जीती, उसने पैसे दे दिए थे....
मैंने अपने नास्ते की बेग से “गुड डे” का पेकेट निकाला...
वो खड़ी होकर अपने बाल ठीक करने लगी और फिर उसे बांधने लगी...
“अरे उसे खुल्ले रखो” मेरा अंतर्मन फिर बोला...
मुझे कभी समज नहीं आया की लडकी के साथ convo कैसे चालू करना चाहिए....
 “चाय अच्छी है” मैंने ऐसे तारीफ की मानो उसने अपने हाथो से ये चाय बनाई हो....
फिर हम बैंकिंग और इंडस्ट्री सेक्टर पर गंभीर चर्चा पे आगे बढ़े...
मुझे समज नहीं आ रहा था की मैं उस लडकी को क्यों पका रहा था ?!
 बिच बिच में मन किया की एक दो शायरी बोल के या कोई जोक सुना के उसे फिर हँसता हुआ देखु....
धीरे धीरे जैसे मैं अपने कम्फर्ट ज़ोन में आया, मेरी जुबान और दिल का कनेक्शन बैठ गया, अब हम दोस्तों की टोन में बात कर रहे थे....
थोड़ी देर में मैं उसे इंजनियरिंग नमूनों के किस्से सुनाने लगा, हम दोनों जोर जोर से हँसने लगे, वहा से निकलने वाले अंकल लोग हमे घूरते हुए जाते थे...
सब सही जा रहा था तभी कबाब में हड्डी आ गई, सोरी आ गया....
“हाय में आयुष इसका दोस्त”
 ‘इसका’??? साले को मेरे अंतर्मन ने गालियों से नवाजा...
“हेल्लो आयुष”
फिर थोड़ी इधर उधर की बाते हुई, पर अब वो मजाक मिसिंग था, कशिश भी वो हसी मिस कर रही थी (शायद), पर मेरा ये नालायक दोस्त अपनी फटी बातो से बाज ही नहीं आ रहा था...
“हे भगवान, इस पापी को तू फिर “टॉर्चर कोल” दे” मेरे अंतर्मन ने भगवान को DM किया...
भगवान ने सुन ली....
“कुश मैं दो मिनिट में आया कोल अटेंड कर के”
मैंने गाड़ी फिर चालू की पर पहेले गियर से...
“so आप कटनी के बारे में कुछ बताओ...”
“क्या बताऊ अब, वो मेरे लिए शायद दुनिया की सबसे खुबसुरत जगह है, मेरा बचपन वही बिता है, पता है हम रेलवे ट्रेक के पास वाली सडक पे साईकिल की रेस लगाया करते थे....”
मैं सुनता गया या बस देखता गया....
मेरे सामने कोई 12-14 की लडकी मुस्कुराके अपनी कहानी बता रही थी...
कितना सुकून...कितनी ख़ुशी....
मैं तो उस मासूमियत में खो गया था...
काश ये ट्रेन यु ही चलती रहे...
काश ये लडकी यु ही बोलती रहे....
“भाई देवास आ गया” आयुष ने फिर गलत वक़्त पे एंट्री मारी थी....
“कुछ खाओगे भाई?” आयुष फिर पेट पूजा की सामग्री लेने जा रहा था....
“नहीं, आप कुछ लोगे?” मैंने कशिश से पूछा...
“no thanks”
अब इंदौर नजदीक था तो हमने हमारा सामान समेटना चालू कर दिया...
कशिश ने तभी अपना मेकउप बॉक्स खोला और अपने चहेरे को बिगाड़ने लगी...
“मत कर यार” अगेईन अंतर्मन....
अब इंदौर बस कुछ मिनीटो की दुरी पर था, आयुष फिर “टॉर्चर कोल” में बिजी था, कशिश सामने बैठी थी...
मैं उसे देख मुस्कुराया, मुझे लगा की अब उसे शायद कभी नहीं मिल पाउँगा, क्या उसे WA या FB के लिए पूछना सही होगा ?? मैं आमतौर पे कभी किसीको नहीं पूछता....
“वो लाइन्स तुमने ही लिखी थी ना ? मुझे मालूम है..... बहुत खुबसुरत लिखा है”
 मैं जवाब में सिर्फ हल्का सा मुस्कुराया...
इंदौर स्टेशन पे ट्रेन आ गई, सब प्लेटफॉर्म के बहार निकले, आयुष ऑटो लेने गया....
“आप काफी खुबसुरत हो”
वो कुछ नहीं बोली बस मेरी आँखों में देखती रही, शायद मेरी आँखों में कुछ ढूंढॅ रही थी वो....
“Bye” वो ज्यादा गहेराइ में जाये उससे पहेले ही मैं अपने रास्ते मुड़ गया....
शुक्रिया J

अपनी टिप्पणियाँ देना ना भूले.....

ट्रेन - 3

ट्रेन - 3

अब ट्रेन कटनी स्टेशन पे थी....
“लो भाई, होम मेड है” चंगेज खान ने मुझे केक ऑफर की...
मैंने एक टुकड़ा उठाया और उसी वक़्त एक आवाज आई “excuse me, जगह दीजिये प्लीज”, बेशक इंजनियरिंग कान ने आवाज सुनके लडकी की ऊम्र का पता लगा लिया था...
हा, ये शाफ़्ट हमारे गियर बॉक्स की थी..... ;)
वो जैसे ही हमारे सेक्शन में दाखिल हुई, एक साथ 16 आँखे उसपे अटक गई...
मैंने केक का टुकड़ा मुह में रखा, वो वाकई लाजवाब थी, सॉफ्ट एंड स्वीट (में यहा केक की बात कर रहा हु ;)) मैंने अगले ही पल अपनि आँखे केक पे केन्द्रित कर ली, पर बाकि की आंखे अभी भी वही अटकी थी, उसने जोर से अपना बेग पछाड़ा और सब जाग गये....
वो फटाफट अपनी सिट पे गई, जो की मेरे सामने की साइड सब से उपर थी....
एक लडकी कैसे पुरे सेक्शन का माहौल बदल सकती है वो अब मुझे समज आ रहा था, सलमान खान बार बार अपने ‘दबंग स्टाइल’ चश्मे से खेल रहा था, मुझे समज नहीं आया की वो इस अँधेरे में काले चश्मे लगाके (इन शोर्ट मिका सिंह बन के) क्या सिद्ध करना चाहता था?!!!
अपना चंगेज खान खुद का पेट अंदर खींचे बैठा था, ऐसा लग रहा था की वो बाबा रामदेव को प्रसन्न करने हेतु तपस्या में बैठा है.....
आयुष अलग अलग एंगल से सेल्फी लेके अपने फोन पे छपे “सेब” के सिम्बोल को एक्सपोस कर रहा था...
मैं उन लोगो को पर्याप्त जगह मिले इस लिए लडकी के नीचे वाली सिट पे सिफ्ट हो गया था...
पर शायद लड़की के फीके रिस्पोंस ने उन लोगो को मायूस कर दिया, कुछ देर में सेक्शन का माहौल फिर से सामान्य हो गया, अब सब नोर्मल थे....
“भाई तुमने अच्छी ली अंकल की”
‘अच्छी ली’ शब्द मुझे थोडा जमा नहीं, पर मैंने उसके जवाब में बस हल्की सी स्माइल दी, आगे भी उस टॉपिक पे काफी चर्चा हुई और बार बार मेरा भी उल्लेख होने लगा, मेरे लिए अब माहौल थोडा स्ट्रेसफुल हो गया, मैं उठ के दरवाजे के पास पहुंच गया.....
बहार सिर्फ अँधेरा था, बहुत दूर कोई किसान टोर्च लेके अपने खेत में घूम रहा था, अचानक मुझे स्टेशन पे खड़े उस फौजी की याद आ गई, मूल्यवान था वो पल जब मैंने “धरती माँ” के दोनों सपूतो के दर्शन एक साथ किये.....
जबलपुर आ गया, सेक्शन खाली होने लगा, आयुष ने नीचे से बेग निकल के मुझे थमा दी...
“एक मिनिट पकड़ में चार्जर निकाल लेता हु”
मैं बेग पकड़ के खड़ा रहा, पर एकबार भी मैंने नजर उपर नहीं उठाई (btw साइंस कहेता है की गरदन को 45 से ज्यादा के एंगल में उपर उठाने से गरदन में दर्द होता है)
“हेल्लो”
आवाज उपर से आ रही थी, 50 के एंगल से......
“आप प्लीज मेरे लिए एक बोटल पानी और स्प्राइट ला देंगे”
“नौकर हु क्या तेरा??!” मेरा अंतर्मन कुछ यु चिल्लाया
“sure” पर पता नहीं गले ने ऐसी आवाज क्यों निकाली ?!
उसने पैसे देने के लिए हाथ आगे किया और मैंने बेग आयुष के पैर पे दे मारा....
“क्या कर रहा है बे, भेन्चो....”
मैं पैसे लेके स्टोल पे गया, बहुत भीड़ थी वहा और आसपास कोई स्प्राइट भी नहीं बेच रहा था, वहा स्प्राइट हासिल करना किसी रोडीज के टास्क से कम नहीं था, पर आखिरकार स्प्राइट मेरे हाथ में थी....
मेरी नजर ट्रेन पर पड़ी...
“ओह्ह नो...”
ट्रेन धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी...
मेरे अन्दर का मिल्खा सिंह जाग गया, और बड़ी मुश्किल से मैंने खुद को ट्रेन के अंदर किया....
साले सारे राज बस सिमरन को ही हाथ देते है....
“मुझे लगा तेरी ट्रेन छुट गई” आयुष चिप्स में बीजी था....
“ओह्ह सोरी मेरी वजह से आपको इतनी परेशानी हुई”
“कुछ खास नहीं” मैंने बेशकीमती स्प्राइट और पानी को उसके हाथ में सौपा...
“थैंक्स”
जवाब में मैंने भी हल्की सी मुस्कान दी...
मेरे साथ वाले बाकि चार इंजनियर हमारे convo से थोड़े uncomfortable लग रहे थे, मैंने माहौल को थोडा मजेदार बनाने के लिए, कृष्णा भाई, नवाब भाई और किट्टूदादा  के कुछ tweets उनके सामने पेश किये ( सेक्शन में लड़की होने की वजह से आइटम Veg होना लाजमी था)
सब लोग मुड में आ गये और महफिल जम गई, हसी मजाक ने दो पल के लिए सारी थकान भुला दी...
मैंने मनोमन अपने Twitter के दोस्तों को सेल्यूट किया.....
हम सबपे अब नींद का नशा चढने लगा था, कुछ पल में हमने एक दुसरो को गुड नाईट बोला....

“साला सपने में भी फोन वाइब्रेट होता है क्या?, अबे नहीं ये तो सच में हो रहा है” मैंने खुद को जगाया...
स्क्रीन पे कोई unknown नम्बर था...
“हेल्लो”
“हेल्लो कुश तुम लोग पागल हो क्या? आयुष को कितने कोल लगाये हर बार स्विचऑफ़ और WA पे भी कोई रिप्लाय नहीं कर रहा”
“अबे आलिया की कजिन जब फोन ही बंध है तो WA पे रिप्लाय क्या मार्क ज़ुकर्बर देगा??!” मेरा अंतर्मन चीख उठा.....
(ये जिसे में रात के बार बजे झेल रहा हु वो आयुष की गर्लफ्रेंड है, बदकिस्मती से)
“अरे नहीं वो क्या है ना यहा का प्लग काम नहीं कर रहा तो उसके फोन की बेटरी डाउन हो गई, मैं सुबह बात करवाता हु उससे”
दो-तीन और डायलोग के बाद मेरा फोन उस भयानक आवाज से आजाद हुआ.....
मुझे अचानक, अपनी gf का मर्डर करके जेल में गये उन बिचारे बॉय फ्रेंड्स के प्रति सवेंदना हुई....
अभी मेरी आँख लगी ही थी की फिर फोन वाइब्रेट हुआ......
“ओह्ह्ह not again...”
पर इस बार उपर वाली बर्थ से वाइब्रेशन की आवाज आ रही थी....
“हेल्लो पापा.... हा में एकदम ठीक हु आप फ़िक्र मत करो....पापा में आपकी बिटिया हु अपने या किसी दूसरी लड़की के साथ किसी हालत में बुरा नहीं होने दूंगी....गुड नाईट”
मुझे ख़ुशी हुई की आज कोई देश की लडकी खुद में छिपी रानी लक्ष्मीबाई को देख रही थी J

ट्रेन का सफर जारी रहेगा अपनी प्रतिक्रिया देना ना भूले....

शुक्रिया J

ट्रेन - 2

ट्रेन - 2

ट्रेन उमरिया जंक्शन पहुंची...
तभी ‘पेट में फुटबोल फ़साये हुए एक अंकल’ (किट्टू दा की भाषा में बोते तो “गर्भवती पुरुष” ;)) हमारे बिच उपस्थित हुए.....
उनके हाथ का पाकिट, गले का चेन और मुह का पान, ये साफ बता रहा था की वो कोई ठेकेदार टाइप काम करते होगे....
“और बेटा क्या करते हो ?”
ट्रेन शुरू होते ही उसने पहेला सवाल मेरे दोस्त की और छोड़ा, मेरे अन्नू मलिक टाइप दोस्त ने अपना रेडियो चालू कर दिया...
मेरे सामने बैठे तीन और इंजनियरो के पास करने को कुछ था नहीं तो उसने भी अंकल के सानिध्य में जाने का फैसला किया. अंकल और चार चैले जनरल इंट्रोडक्शन के बाद थोडा आगे बढ़े, उन्होंने पहले क्रिकेट का एनकाउंटर करने का फैसला किया....
“ये धोनी इंडिया को डुबोके छोड़ेगा”
मैं धोनी और त्सुनामी के बीच का कनेक्शन ढूँढने लगा...
अगले कुछ मिनीटो तक अंकल ने धोनी & कम्पनी की ऐसी बजाई की अगर धोनी ये सुन लेता तो पूरी टीम इंडिया “सामूहिक संयास” की घोषणा कर देती.....
तभी वहा से एक आदमी, बड़े बेग में कुछ पतली किताबे और मैगज़ीन भर के निकला, उसने हर तरह की पुस्तिका थी, ‘लेटेस्ट जनरल नोलेज’ से लेके ‘101 थाई व्यंजन’....
ट्विटर के कुछ फर्जी शायरों को उपयोगी ऐसी “रंगीन शायरिया” भी थी....
साइड के बर्थ पे बैठे एक “सेमी बूढ़े अंकल” ने उस आदमी को धीरे से कुछ पूछा, और उस आदमी ने उस जादुई बक्शे में से एक पतली पुस्तिका निकाली, टाइटल शायद “जवानी की कहानी” था, अंकल खुश हुए...
पैसे देके वो फटाफट साइड उपर बर्थ में चले गये, साधना करने.....
तो हमारे ज्ञानी अंकल ने अब राजनीती की हत्या करने का फैसला लिया था, उन्होंने सरकार की नीतियों पे सवाल खड़े किये, अब वहा का माहौल किसी न्यूज़रूम जैसा था और अपने अंकल थे पोलिटिकल एक्सपर्ट....
 “देश का कुछ नही हो सकता, ये स्वछता अभियान बस पैसो की बर्बादी है और कुछ नहीं, ये देखो रेल के हालात में कुछ फर्क पड़ा क्या ?” अंकल ने डायलोग खत्म कर के पान मसाला निकला, उसे खोल के अपने मुह में अर्पण किया और उस तुच्छ रेपर को सामने की सिट के नीचे पहुंचा दिया...
“बेटा तुम आगे क्या करोगे ?”
अंकल ने Mr.फॉर्मल सूज से पुछा,
“अंकल जॉब करनी है सरकारी हो तो ज्यादा अच्छा है”
फिर अंकल ने कुछ बिलकुल ही नॉन टेक्निकल सवाल पूछे जो किसी इंजनियरिंग किताब में नहीं थे नाही नई इंडस्ट्री में किसी काम के, कुछ प्रश्नों का जवाब देने की बन्दे ने कोशिश की पर अंकल ने उसे और उलजा दिया, मेरे पास बैठे और तीन इंजनियर इस बहस में उतर पड़े पर अंकल सबको अपने अंदाज में बैज्जत करने लगे, मैंने महसूस किया की यहा सिर्फ इस लडको की बेइजती नहीं हो रही बल्कि पुरे इंजनियरिंग जमात की बेइजती हो रही थी, अब पानी सिर के उपर चढ़ रहा था....
“अच्छा तो अंकल आप कब कुए से बहार निकल रहे हो ?” मैंने 140 की स्पीड का योर्कर फेका....
“क्या” अंकल किसी टेल एंडर बेट्समेन की तरह हक्का बक्का रह गये...
“यही की आप अपने दिमाग के दरवाजे कब खोल ने वाले हो ?” मैंने अपनी लाइन लेंग्थ बनाई रखी...
“तुम्हे बडो से बात करने की तमीज...”
“तमीज है तभी आप कहके बात कर रहा हु, और में यहा कोई बहेस नहीं कर रहा हु बस जवाब दे रहा हु आपके सवालों का” मैंने ‘चाणक्य डिप्लोमसी’ से मुद्दे को अपने हाथ में लिया...
“आपको अमेरिका का भारत आना पसंद नही है, हम लोगो का MNC में काम करना पसंद नहीं है, बहार की टेक्नोलोजी का सीखना पसंद नही है क्यों की आपको लगता है की वो हमारी विरासत को खत्म कर देगी...
माफ़ करना अंकल में पर आप यहा गलत हो...
हमारी आने वाली पीढ़ीयो को अच्छी विरासत देने के लिए हमे ये करना जरुरी है, दुनिया के कदम से कदम मिला के चलने के लिए हमे ये करना जरुरी है, संस्कृति और विरासत के नाम पे अब हम देश को गोबर से ढंक के नहीं रख सकते अब बदलाव जरुरी है अंकल”
“सिर्फ बातो करने से कुछ नही होता, तुमने अभी दुनिया नहीं देखि, तुम अभी अंगूठाछाप हो अंगूठाछाप...”
“हमारी स्किल और नोलेज पर सवाल उठाने से पहले ये जान लीजिये की इस दशा के भी जिम्मेदार आप जैसे लोग ही है जो नये और बिन अनुभवी लोगो को सदा नीचा दिखाने की फ़िराक में होते है, कभी आप भी अंगूठाछाप रहे होंगे आपको अगर कोई कुछ नहीं सिखाता तो आज आप हमसे ये बाते करने के काबिल भी होते क्या ?.....
 आप यूथ का पोटेंशियल देखो ना, हरबार उसे बाबा आदम के टाइम के पेरामीटर में क्यों तोलते हो ?”
मुझे पता नहीं रहा की जवाब देते देते मेरी आवाज कब उपर चली गई, पुरे सेक्शन की हर मुंडी मेरी और मुड़ी हुई थी, सिवाय एक के...
साइड अपर बर्थ पे बिराजमान अंकल अभी भी “जवानी की कहानी” में घुसे हुए थे, मुझे ख्याल आया की ह्यूमन नेचर में आज भी सेक्स सबसे रसप्रद मुद्दा है....
मेरे सामने बैठे अंकल की पिस्तल में अब गोलिया खत्म हो गई थी, मेरे पास बैठे चारो इंजनियर के चहेरो पे ख़ुशी थी( जित की ख़ुशी कहेना ठीक नहीं होगा) सेक्शन का हर आदमी अब मुझे पहचान ने लगा था....
अंकल ने फिर पान मसाला निकाला और मैंने एक और तीर....
“हम स्वछता अभियान की बात करते है, पर ये क्या सिर्फ सरकार का काम है?, क्या हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है इसके प्रति ?”
तीर एकदम निशाने पर लगा...
अंकल ने खाली रेपर अपनी जेब में रख दिया....
थोड़ी देर तक आसपास के लोगो से नोर्मल बाते होती रही, अंकल चुप थे...
“सोरी अंकल अगर आपको किसी बात का बुरा लगा हो तो” मैंने भारतीय मूल्यों के जतन करने की कोशिश की...
“अरे बेटा तुमने बिलकुल सही कहा और अपना पक्ष रखने की वजह से कभी किसी से माफ़ी मत मांगना” अंकल की टोन एकदम सामान्य थी जो मुझे अच्छा लगा...
फिर कटनी स्टेशन तक हम अलग अलग मुद्दों पे नोर्मल बात करते रहे, उनकी वजह से मुझे संस्कृत से लेके पर्यावरण तक विषयों में उपयोगी ऐसी काफी जानकारी मिली...
“तुम से मिलके अच्छा लगा बेटा, गुड लक”
“थैंक यू, अंकल”
हमारी ऐसी बोन्डिंग देख के आसपास वाले लोग काफी अजीब महसूस कर रहे थे.....
अब ट्रेन कटनी स्टेशन पे थी....
“लो भाई, होम मेड है” चंगेज खान ने मुझे केक ऑफर की...
मैंने एक टुकड़ा उठाया और उसी वक़्त एक आवाज आई “excuse me, जगह दीजिये प्लीज”, बेशक इंजनियरिंग कान ने आवाज सुनके लडकी की ऊम्र का पता लगा लिया था...

हा, ये शाफ़्ट हमारे गियर बॉक्स की थी..... ;)        

गुरुवार, 5 मार्च 2015

ट्रेन 1

ट्रेन - 1
“अरे भाग नहीं तो ट्रेन छुट जाएगी”
मेरे आगे दौड़ रहे साढ़े पांच फुट के दोस्त के कंधो पे उसके वजन के पांचवे हिस्से का बोज टंगा हुआ था| इस बोज की वजह से उसकी पीठ 60 के एंगल पर झुक गई थी|
भारतीय रेल की परम्परा निभाते हुए हमारी नर्मदा एक्सप्रेस भी पुरे 2 घंटे लेट थी| किसी आर्मी सेशन सी एनर्जी वेस्ट करने के बाद अब मेरा दोस्त उसे रिकवर करने में लगा था, अबतक का स्कोर था 2 पेकेट चिप्स पर एक बोटल स्प्राइट|
उस वक़्त इंडियन रेल ने गालिया खाने के मामले में आशुतोष,KRK एवम् आफ्रीदी को पीछे छोड़ दिया था| प्लेटफोर्म की घड़ी थोडा ‘uncomfortable’ महसूस कर रही थी, साला हर कोई उसे घूरे जा रहा था| कुछ महानुभाव पटरी को ऐसे देख रहे थे की उनकी “दीर्घद्रष्टि” से चमत्कार होगा और नर्मदा एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म पे प्रगट हो जाएगी|
आखिर ट्रेन प्लेटफॉर्म पे आ पहुंची| लोग जोम्बिज की तरह ट्रेन पे टूट पड़े, हमने भी अपनी सिटे संभालली| हमारे सेक्शन में तीन और लडके थे जो लीगली वहा बैठ सकते थे पर कुछ टिपिकल इंडियन अंकल्स ‘बेटा जरा एडजस्ट करना’ बोलके बकायदा हमारी सिटो पे कब्जा जमा रहे थे|
“हाय, में आयुष और ये मेरा दोस्त कुश”
मेरे फ्रेंक दोस्त ने हमउम्र लड़को को मैत्री प्रस्ताव भेजा, सामने से भी उत्साहभरा रिप्लाय आया, मुझे उनके नाम याद नहीं रहे क्युकी में तो उनके सतरंगी कपड़ो को ही देख रहा था|
विंडो सिट पे बैठा लड़का बेशक सलमान खान का फेन होगा, उसके ‘भाई छाप’ ब्रेसलेट से मैंने अनुमान लगाया| उसके पास वाला लड़का थोडा मोटा सा था, उसने ब्लू कलर का पार्टी वेयर शर्ट पहना था| मेरे अंतर्मन में उसके लुक को थोडा एडिट करने के बाद मैंने पाया की उसमे और पोर्न मूवीज के प्रोडूसर में काफी समानताए थी, मेरी आँखे ‘शक मोड़’ में आ गई, उसके पास वाला लड़का शक्ल से ही इंजीनयर दिख रहा था, वो यह भी इंटरव्यू में पहनने लायक फॉर्मल शूज पहने बैठा था, क्या पता कोई नौकरी ट्रेन में उसका इंतजार कर रही हो ?
“हम महेंद्रगढ़ गये थे, वहा हमारे दोस्त के भाई की शादी थी, बड़ी मस्त जगह है” मेरे इंजीनयर दोस्त ने पूरी रिपोर्ट पेश की|
“हम भी हमारे दोस्त की शादी में गये थे, वैसे आप क्या करते हो ?”
“में इंजीनयर हु”
“अरे, हम भी....” और तीनो ने एकसाथ मेरे दोस्त को ‘हैप्पीदेंट स्माइल” दिखाई|
“जुते अच्छे है भाई तेरे” सलमान खान मेरे जूतों की तारीफ कर रहा था| में थैंक्स बोलू उससे पहले बिच में बैठा ‘चंगेज खान’ (अरुणलाल की भाषा में बोले तो)  convo की दिशा में चतुराई से परिवर्तन कर गया|
“ऐसे ही सेम थे मेरे भाई के पास”
“वो वाले डूब्लीकेट थे ये ओरिजनल दिख रहे है, देख Reebok का स्पेलिंग भी सही है”
“लो भाई अब 60 रुपए के ‘दबंग स्टाइल’ चश्मे पहनने वाले ओरिजनल और डूब्लिकेट और असली की बाते करेंगे” चंगेज खान ने घी डाल दिया था, बात मुझतक पहुंचे उससे पहेले ही मैंने “कट लेना” का फैसला किया....
“मैं फोन चार्ज कर के आता हु” अपने दोस्त को बोल के में बहेस से बहार निकला|
मैं अब दरवाजे के पास खड़ा होकर खुल्ली हवाओ का लुफ्त उठा रहा था, रेल आपको असली भारत का सफर करवाती है, यहाँ आप देश के हर रंग से रूबरू होते हो...
“चना चना चना”
“एक कर दो” प्लेट या पेकेट जैसे कुछ शब्द मुझे समज नहीं आये तो मैंने सिर्फ नंबर बोलना ज्यादा सही समजा|
आमतौर पे मैं ट्रेन में कोई खाने की चीज नहीं खरीदता पर ये कुछ ज्यादा ट्रेडिशनल लग रहा था तो मैंने उसे आजमाने का सोचा|
पेड़ के पत्तो से बने बाउल में उसने कुछ चने लिए उसमे प्याज, नमक, निम्बू और दो चार दुसरे मसाले डालके  उसे उसने अपने एक खास अंदाज में मिलाया, किसी साऊथ के हीरो की तरह| उस क्रिया में उसकी ख़ुशी साफ जलक रही थी...
शायद वो अपना अंदाज सबको दिखाना चाहता था....
शायद वो अपनी कोई मज़बूरी छिपाना चाहता था....

मैंने चने चखे और उसी बीच मेरा दोस्त आ टपका...
“अरे चने....”
बिना किसी देरी के एक आदर्श इंजीनयर की तरह उसने अपने मुह में जितने डाल सकता था उतने चने एकसाथ डाल दिए!
“अच्छे है....”
मुझे समज नहीं आया की आवाज को बहार निकलने की जगह कहा से मिल गई?
ट्रेन रुक रुक के चलती गई और हमे भिन्न भिन्न प्रकार के प्राणी के दर्शन होते रहे....

ट्रेन उमरिया जंक्शन पहुंची...

अभी तो सफ़र शुरू हुआ है, इन्दोर तक के इस सफर में अभी बहुत कुछ होना बाकि है....
आगे का सफर ट्रेन-2 में...
अपनी प्रतिक्रिया जरुर देवे.... ;)